बाढ़ नहीं है, *प्रकृति का प्रहार* है ये
बाढ़ नहीं है, *प्रकृति का प्रहार* है ये
बाढ़ नहीं है, *प्रकृति का प्रहार* है ये,
चिंता की कोई बात नहीं है, *बिहार* है ये.
कभी *तलवार*, कभी गोली, कभी बम,
एक से एक बढ़कर आते हैं *सितम*.
किसी भी *आपदा के लिए तैयार* है ये,
*चिंता की कोई बात नहीं है, बिहार है ये.*
कभी *जग्गू, कभी कर्पूरी, कभी सतीश,*
कभी *लालू* कभी *माँझी* कभी *नीतीश.*
हर कोई *बिहार पर आपदा* बनकर आया,
कोई *बिहार का कुछ नहीं बिगाड़* पाया.
हर *जाति को मौका* देने को तैयार है ये,
*चिंता की कोई बात नहीं है, बिहार है ये.*
*बाढ़ बिहार के लिए* कोई नई *बात* नहीं है,
हर बरस आती है, *हज़ारों गाँव डुबाती* है.
अबकी *पटना डूबा*, इसीलिए *हाहाकार* है ये,
*चिंता की कोई बात नहीं है, बिहार है ये.*
गाँव वाले *बिहारियों को तैरना* आता है,
*शहरी मीडिया* उधर जा ही नहीं पाता है.
जब *रिपोर्टर कैमरा* सहित ही *डूब* जाएगा,
तो भला *बाढ़ की खबर* कैसे बता पाएगा?
*हवाई यात्रा* वाले *पटना में लैंड* तो कर जा रहे हैं,
लेकिन *एयरपोर्ट से निकल* ही नहीं पा रहे हैं.
इसीलिए इसबार *ज्यादा प्रचार प्रसार* है,
*पर चिंता की कोई बात नहीं, ये बिहार है.*
*पानी* कितना भी हो जाए *पटना* में,
कितनी भी *जानें चली जाएँ दुर्घटना* में.
इतना *पानी भी जाति को* नहीं धो पाएगा,
*राहत जाति के अनुसार ही बाँटा जाएगा.*
यही *सच्चाई* है, यही यहाँ का *सदाचार* है,
*चिंता की कोई बात नहीं है, ये बिहार है.*
यहाँ *आदमी* नहीं, *जाति के कर्णधार* रहते हैं.
इसके नाम में ही *हार* है, इसे *बि-हार* कहते हैं.
चंदन कुमार उर्फ मनीष अग्रवाल
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