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मेरे पहले प्यार / कुमार विश्वास

मेरे पहले प्यार / कुमार विश्वास ओ प्रीत भरे संगीत भरे! ओ मेरे पहले प्यार! मुझे तू याद न आया कर ओ शक्ति भरे अनुरक्ति भरे! नस-नस के पहले ज्वार! मुझे तू याद न आया कर। पावस की प्रथम फुहारों से  जिसने मुझको कुछ बोल दिये मेरे आँसु मुस्कानों की कीमत पर जिसने तोल दिये जिसने अहसास दिया मुझको  मै अम्बर तक उठ सकता हूं जिसने खुद को बाँधा लेकिन  मेरे सब बंधन खोल दिये ओ अनजाने आकर्षण से! ओ पावन मधुर समर्पण से! मेरे गीतों के सार  मुझे तू याद न आया कर। मूझे पता चला मधुरे तू भी पागल बन रोती है, जो पीङा मेरे अंतर में तेरे दिल में भी होती है लेकिन इन बातों से किंचिंत भी अपना धैर्य नहीं खोना मेरे मन की सीपी में अब तक तेरे मन का मोती है, ओ सहज सरल पलकों वाले!  ओ कुंचित घन अलकों वाले! हँसते गाते स्वीकार  मुझे तू याद न आया कर। ओ मेरे पहले प्यार  मुझे तू याद न आया कर

बाँसुरी चली आओ / कुमार विश्वास

बाँसुरी चली आओ /  कुमार विश्वास तुम अगर नहीं आई गीत गा न पाऊँगा साँस साथ छोडेगी, सुर सजा न पाऊँगा तान भावना की है शब्द-शब्द दर्पण है बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है तीर पार कान्हा से दूर राधिका-सी है रात की उदासी को याद संग खेला है  कुछ गलत ना कर बैठें मन बहुत अकेला है औषधि चली आओ चोट का निमंत्रण है बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है तुम बिना हथेली की हर लकीर प्यासी है तीर पार कान्हा से दूर राधिका-सी है रात की उदासी को याद संग खेला है  कुछ गलत ना कर बैठें मन बहुत अकेला है औषधि चली आओ चोट का निमंत्रण है बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है तुम अलग हुई मुझसे साँस की ख़ताओं से भूख की दलीलों से वक्त की सज़ाओं से दूरियों को मालूम है दर्द कैसे सहना है आँख लाख चाहे पर होंठ से न कहना है कंचना कसौटी को खोट का निमंत्रण है बाँसुरी चली आओ, होंठ का निमंत्रण है

मुक्तक / कुमार विश्वास

मुक्तक / कुमार विश्वास बस्ती बस्ती घोर उदासी पर्वत पर्वत खालीपन मन हीरा बेमोल बिक गया घिस घिस रीता तन चंदन इस धरती से उस अम्बर तक दो ही चीज़ गज़ब की है एक तो तेरा भोलापन है एक मेरा दीवानापन||1|| जिसकी धुन पर दुनिया नाचे, दिल एक ऐसा इकतारा है, जो हमको भी प्यारा है और, जो तुमको भी प्यारा है. झूम रही है सारी दुनिया, जबकि हमारे गीतों पर, तब कहती हो प्यार हुआ है, क्या अहसान तुम्हारा है||2|| जो धरती से अम्बर जोड़े, उसका नाम मोहब्बत है , जो शीशे से पत्थर तोड़े, उसका नाम मोहब्बत है , कतरा कतरा सागर तक तो,जाती है हर उमर मगर , बहता दरिया वापस मोड़े, उसका नाम मोहब्बत है||3|| बहुत टूटा बहुत बिखरा थपेड़े सह नहीं पाया हवाओं के इशारों पर मगर मैं बह नहीं पाया रहा है अनसुना और अनकहा ही प्यार का किस्सा कभी तुम सुन नहीं पायी कभी मैं कह नहीं पाया||4|| तुम्हारे पास हूँ लेकिन जो दूरी है समझता हूँ तुम्हारे बिन मेरी हस्ती अधूरी है समझता हूँ तुम्हे मैं भूल जाऊँगा ये मुमकिन है नहीं लेकिन तुम्ही को भूलना सबसे ज़रूरी है समझता हूँ||5|| पनाहों में जो आया हो तो उस पर वार करना क्या जो दिल हारा हुआ हो उस पर ...

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा

भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा:-कुमार विश्वास भ्रमर कोई कुमुदनी पर मचल बैठा तो हंगामा हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा अभी तक डूबकर सुनते थे सब किस्सा मुहब्बत का मैं किस्से को हकीकत में बदल बैठा तो हंगामा कभी कोई जो खुलकर हंस लिया दो पल तो हंगामा कोई ख़्वाबों में आकर बस लिया दो पल तो हंगामा मैं उससे दूर था तो शोर था साजिश है , साजिश है उसे बाहों में खुलकर कस लिया दो पल तो हंगामा जब आता है जीवन में खयालातों का हंगामा ये जज्बातों, मुलाकातों हंसी रातों का हंगामा जवानी के क़यामत दौर में यह सोचते हैं सब ये हंगामे की रातें हैं या है रातों का हंगामा कलम को खून में खुद के डुबोता हूँ तो हंगामा  गिरेबां अपना आंसू में भिगोता हूँ तो हंगामा  नही मुझ पर भी जो खुद की खबर वो है जमाने पर  मैं हंसता हूँ तो हंगामा, मैं रोता हूँ तो हंगामा इबारत से गुनाहों तक की मंजिल में है हंगामा ज़रा-सी पी के आये बस तो महफ़िल में है हंगामा कभी बचपन, जवानी और बुढापे में है हंगामा जेहन में है कभी तो फिर कभी दिल में है हंगामा हुए पैदा तो धरती पर हुआ आबाद हंगामा जवानी को हमारी कर ग...

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है

कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है:-कुमार विश्वास कोई दीवाना कहता है, कोई पागल समझता है ! मगर धरती की बेचैनी को बस बादल समझता है !! मैं तुझसे दूर कैसा हूँ , तू मुझसे दूर कैसी है ! ये तेरा दिल समझता है या मेरा दिल समझता है !! मोहब्बत एक अहसासों की पावन सी कहानी है ! कभी कबिरा दीवाना था कभी मीरा दीवानी है !! यहाँ सब लोग कहते हैं, मेरी आंखों में आँसू हैं ! जो तू समझे तो मोती है, जो ना समझे तो पानी है !! समंदर पीर का अन्दर है, लेकिन रो नही सकता ! यह आँसू प्यार का मोती है, इसको खो नही सकता !! मेरी चाहत को दुल्हन तू बना लेना, मगर सुन ले ! जो मेरा हो नही पाया, वो तेरा हो नही सकता !! भ्रमर कोई कुमुदुनी पर मचल बैठा तो हंगामा! हमारे दिल में कोई ख्वाब पल बैठा तो हंगामा!! अभी तक डूब कर सुनते थे सब किस्सा मोहब्बत का! मैं किस्से को हकीक़त में बदल बैठा तो हंगामा!!

अमावस की काली रातों में / कुमार विश्वास Kumar Vishwas

अमावस की काली रातों में / कुमार विश्वास Kumar Vishwas मावस की काली रातों में दिल का दरवाजा खुलता है, जब दर्द की काली रातों में गम आंसू के संग घुलता है, जब पिछवाड़े के कमरे में हम निपट अकेले होते हैं, जब घड़ियाँ टिक-टिक चलती हैं,सब सोते हैं, हम रोते हैं, जब बार-बार दोहराने से सारी यादें चुक जाती हैं, जब ऊँच-नीच समझाने में माथे की नस दुःख जाती है, तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है, और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है। जब पोथे खाली होते है, जब हर्फ़ सवाली होते हैं, जब गज़लें रास नही आती, अफ़साने गाली होते हैं, जब बासी फीकी धूप समेटे दिन जल्दी ढल जता है, जब सूरज का लश्कर छत से गलियों में देर से जाता है, जब जल्दी घर जाने की इच्छा मन ही मन घुट जाती है, जब कालेज से घर लाने वाली पहली बस छुट जाती है, जब बेमन से खाना खाने पर माँ गुस्सा हो जाती है, जब लाख मन करने पर भी पारो पढ़ने आ जाती है, जब अपना हर मनचाहा काम कोई लाचारी लगता है, तब एक पगली लड़की के बिन जीना गद्दारी लगता है, और उस पगली लड़की के बिन मरना भी भारी लगता है। जब कमरे में सन्नाटे की आवाज़ ...