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हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाये मोहन मुंतजिर

 हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाये, करोगी मोहब्बत तो चेहरे पर उदासी छाएगी जो छाएगी उदासी तो तुझे नींद ना आएगी नींद न आएगी तो चेहरे पर असर आएगा चेहरे पर असर आएगा तो तू नजरे चुरायेगा फिर जाने कब तलक हमसे मिलने ना आयेगा तू मिलने न आये हमसे ऐसी नोबत ही क्यों आये हम चाहते ही नही मोहब्बत हो जाये करोगी मोहब्बत तो कुछ यूँ मोहब्बत होगी कभी शक होगा मुझपे कभी शिकायत होगी जिनसे बास्ता नहीं उनसे अदावत होगी शहर से नफरत दुनिया से बगावत होगी हम सह जायेंगे तुम न सह पाओगी कैसे जमाने के सितम उठाओगी समझायेंगे घर बाले तो मुझसे खफा हो जाओगी मैं तन्हा रह जाऊंगा तुम बेबफा हो जाओगी तुम हो जाओ बेबफा ऐसी नोवत ही क्यों आये हम चाहते ही नहीं मोहब्बत हो जाये करोगी मोहब्बत तो इज़हार भी करना होगा ज़माने से छुपकर प्यार भी करना होगा तुझपर पड़ने लगेंगी दुनिया की नजरें मुझपर रहने लगेंगी दुनिया की नजरे फिर देखना तुम ये समझोता कर लोगी हमें छोड़कर इश्क दूसरा कर लोगी वो तुम्हे मिल जायेगा तुम खूबसूरत हो ख्वाहिश हो सबकी हसीन सूरत हो आहिस्ता -2 तेरी उम्र खफा हो जाएगी तेर...