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जुलाई, 2019 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

कालिदास! सच-सच बतलाना/बाबा नागार्जुन

कालिदास! सच-सच बतलाना  इन्दुमती के मृत्युशोक से  अज रोया या तुम रोये थे?  कालिदास! सच-सच बतलाना!  शिवजी की तीसरी आँख से  निकली हुई महाज्वाला में  घृत-मिश्रित सूखी समिधा-सम  कामदेव जब भस्म हो गया  रति का क्रंदन सुन आँसू से  तुमने ही तो दृग धोये थे  कालिदास! सच-सच बतलाना  रति रोयी या तुम रोये थे?  वर्षा ऋतु की स्निग्ध भूमिका  प्रथम दिवस आषाढ़ मास का  देख गगन में श्याम घन-घटा  विधुर यक्ष का मन जब उचटा  खड़े-खड़े तब हाथ जोड़कर  चित्रकूट से सुभग शिखर पर  उस बेचारे ने भेजा था  जिनके ही द्वारा संदेशा  उन पुष्करावर्त मेघों का  साथी बनकर उड़ने वाले  कालिदास! सच-सच बतलाना  पर पीड़ा से पूर-पूर हो  थक-थककर औ' चूर-चूर हो  अमल-धवल गिरि के शिखरों पर  प्रियवर! तुम कब तक सोये थे?  रोया यक्ष कि तुम रोये थे!  कालिदास! सच-सच बतलाना!                                       ...

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए/दुष्यंत कुमार

हो गई है पीर पर्वत-सी पिघलनी चाहिए, इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए। आज यह दीवार, परदों की तरह हिलने लगी, शर्त लेकिन थी कि ये बुनियाद हिलनी चाहिए। हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में, हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए। सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, सारी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए। मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में सही, हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए। दुष्यंत कुमार

ठुकरा दो या प्यार करो / सुभद्रा कुमारी चौहान

देव ! तुम्हारे कई उपासक कई ढंग से आते हैं। सेवा में बहुमूल्य भेंट वे कई रंग की लाते हैं।। धूमधाम से साजबाज से मंदिर में वे आते हैं। मुक्तामणि बहुमूल्य वस्तुऐं लाकर तुम्हें चढ़ाते हैं।। मैं ही हूँ गरीबनी ऐसी जो कुछ साथ नहीं लाई। फिर भी साहस कर मंदिर में पूजा करने चली आई।। धूप, दीप, नैवैद्य नहीं है झाँकी का श्रृंगार नहीं। हाय ! गले में पहनाने को फूलों का भी हार नहीं।। मैं कैसे स्तुति करूँ तुम्हारी ? है स्वर में माधुर्य नहीं। मन का भाव प्रकट करने को वाणी में चातुर्य नहीं।। नहीं दान है, नहीं दक्षिणा खाली हाथ चली आई। पूजा की विधि नहीं जानती फिर भी नाथ ! चली आई।। पूजा और पुजापा प्रभुवर इसी पुजारिन को समझो। दान-दक्षिणा और निछावर इसी भिखारिन को समझो।। मैं उन्मत्त प्रेम की प्यासी ह्रदय दिखाने आई हूँ। जो कुछ है, बस यही पास है इसे चढ़ाने आई हूँ।। चरणों पर अर्पित है, इसको चाहो तो स्वीकार करो। यह तो वस्तु तुम्हारी ही है ठुकरा दो या प्यार करो।। सुभद्रा कुमारी चौहान

पांच पूत भारत माता के/बाबा नागार्जुन

 पांच पूत भारत माता के, दुश्मन था खूंखार गोली खाकर एक मर गया, बाकी रह गए चार | चार पूत भारत माता के, चारों चतुर प्रवीन, देश निकाला मिला एक को, बाकी रह गए तीन | तीन पुत्र भारत माता के, लड़ने लग गए वो, अलग हो गया इधर एक, अब बाकी रह गए दो | दो बेटे भारत माता के, छोड़ पुरानी टेक, चिपक गया है इक गद्दी से, बाकी रह गया एक | एक पुत्र भारत माता का, कंधे पर है झंडा, पुलिस पकड़ के जेल ले गई, बाकी रह गया अंडा | बाबा नागार्जुन      

इन्दु जी क्या हुआ आपको / नागार्जुन

क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको? सत्ता की मस्ती में  भूल गई बाप को? इन्दु जी, इन्दु जी, क्या हुआ आपको? बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को! क्या हुआ आपको? क्या हुआ आपको?  आपकी चाल-ढाल देख- देख लोग हैं दंग हकूमती नशे का वाह-वाह कैसा चढ़ा रंग सच-सच बताओ भी क्या हुआ आपको यों भला भूल गईं बाप को! छात्रों के लहू का चस्का लगा आपको काले चिकने माल का मस्का लगा आपको किसी ने टोका तो ठस्का लगा आपको अन्ट-शन्ट बक रही जनून में शासन का नशा घुला ख़ून में फूल से भी हल्का समझ लिया आपने हत्या के पाप को इन्दु जी, क्या हुआ आपको बेटे को तार दिया, बोर दिया बाप को! बचपन में गांधी के पास रहीं तरुणाई में टैगोर के पास रहीं अब क्यों उलट दिया 'संगत' की छाप को? क्या हुआ आपको, क्या हुआ आपको बेटे को याद रखा, भूल गई बाप को इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी, इन्दु जी... रानी महारानी आप नवाबों की नानी आप नफ़ाख़ोर सेठों की अपनी सगी माई आप काले बाज़ार की कीचड़ आप, काई आप सुन रहीं गिन रहीं गिन रहीं सुन रहीं सुन रहीं सुन रहीं गिन रहीं गिन रहीं हिटलर के घोड़े की एक-एक टाप को एक-एक टाप को, एक-एक टाप को सुन रहीं गिन रहीं एक-एक ...